Procedure of file a civil suit

सिविल वाद संस्थित करने की प्रक्रिया: एक तात्विक एवं रणनीतिक विवेचना

सिविल वाद संस्थित करने की प्रक्रिया

विधिक सूचना से वादपत्र प्रस्तुतीकरण तक का एक तात्विक एवं रणनीतिक विवेचन

सिविल वाद की शुरुआत, किसी भवन की नींव रखने के समान है; यदि नींव ही त्रुटिपूर्ण या कमजोर हो, तो संपूर्ण संरचना का ढह जाना निश्चित है। वाद संस्थित करना केवल न्यायालय में एक दस्तावेज प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि यह एक सूक्ष्म, रणनीतिक और प्रक्रियात्मक रूप से सटीक कार्य है। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) इस प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के लिए एक विस्तृत ढांचा प्रदान करती है। यह आलेख वाद-पूर्व तैयारियों से लेकर न्यायालय द्वारा वाद के पंजीकरण तक की यात्रा का एक चरण-दर-चरण और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


चरण I: वाद-पूर्व तैयारी (Pre-Filing Strategy)

एक सफल वाद की शुरुआत न्यायालय के बाहर, अधिवक्ता के कक्ष में होती है।

वाद-हेतुक एवं परिसीमा का निर्धारण (Cause of Action & Limitation)

वाद-हेतुक (Cause of Action): यह तथ्यों का वह समूह है जिसे साबित करने पर वादी को अनुतोष प्राप्त करने का अधिकार मिलता है। इसके बिना कोई वाद संस्थित नहीं हो सकता।
परिसीमा (Limitation): परिसीमा अधिनियम, 1963 के तहत प्रत्येक वाद के लिए एक समय-सीमा निर्धारित है। यदि वाद उस सीमा के बाद दायर किया जाता है, तो वह काल-वर्जित (time-barred) हो जाएगा और खारिज कर दिया जाएगा। यह प्रतिरक्षा का एक पूर्ण आधार है।

विधिक सूचना भेजना (Issuance of Legal Notice) - धारा ८० CPC

सरकार या किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध वाद दायर करने से पूर्व धारा ८० के तहत दो महीने की एक वैधानिक सूचना देना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य सरकार को मामले पर पुनर्विचार करने और मुकदमेबाजी से बचने का अवसर देना है।

रणनीतिक महत्व (निजी वादों में)

हालांकि निजी वादों में यह अनिवार्य नहीं है, फिर भी एक विधिक सूचना भेजना अत्यंत लाभकारी होता है। यह वादी कीสุจริตใจ (bona fides) को दर्शाता है, विरोधी पक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता है, और कई बार मामला न्यायालय के बाहर ही सुलझ जाता है, जिससे समय और धन दोनों की बचत होती है।


चरण II: वाद का हृदय - वादपत्र (The Plaint)

वादपत्र (Plaint) वह पवित्र दस्तावेज है जिस पर संपूर्ण वाद की इमारत खड़ी होती है। इसका आलेखन अत्यधिक कौशल और सटीकता की मांग करता है।

वाद-पत्र का आलेखन (Drafting the Plaint) - आदेश VI एवं VII

आदेश VII, नियम 1 वादपत्र की अनिवार्य अंतर्वस्तु को सूचीबद्ध करता है, जिसमें न्यायालय का नाम, पक्षकारों का विवरण, वाद-हेतुक, क्षेत्राधिकार का कथन और मांगा गया अनुतोष शामिल है।

अभिवचन के स्वर्णिम नियम

आदेश VI, नियम 2 के अनुसार, अभिवचन में केवल तात्विक तथ्यों (Material Facts) का ही वर्णन होना चाहिए, न कि विधि (Law) या साक्ष्य (Evidence) का। प्रत्येक पैराग्राफ को क्रमिक रूप से संख्यांकित किया जाना चाहिए। अस्पष्ट या परस्पर विरोधी कथन आपके मामले को गंभीर रूप से कमजोर कर सकते हैं। एक ही वाद में असंगत अभिवचन (inconsistent pleadings) की अनुमति है, परन्तु परस्पर विनाशकारी (mutually destructive) अभिवचन की नहीं।

सत्यापन एवं शपथ-पत्र (Verification & Affidavit)

प्रत्येक वादपत्र के अंत में एक सत्यापन होता है, जिसमें वादी यह पुष्टि करता है कि वादपत्र की अंतर्वस्तु उसकी जानकारी और विश्वास में सत्य है। आदेश VI, नियम 15 के 2002 के संशोधन के बाद, अभिवचन को एक शपथ-पत्र (Affidavit) द्वारा भी समर्थित किया जाना आवश्यक है।


चरण III: न्यायालयीन प्रक्रिया (Court Procedures)

वाद का मूल्यांकन एवं न्यायालय शुल्क (Valuation & Court Fees)

प्रत्येक वाद का अनुतोष के आधार पर एक आर्थिक मूल्यांकन किया जाता है। यह न्यायालय शुल्क अधिनियम, 1870 एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1887 द्वारा शासित होता है। यह मूल्यांकन न केवल न्यायालय शुल्क की राशि निर्धारित करता है, बल्कि न्यायालय के आर्थिक क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) को भी तय करता है।

विधिक विश्लेषण

उच्चतम न्यायालय ने मीनाक्षीसुंदरम चेट्टियार बनाम वेंकटाचलम चेट्टियार, AIR 1979 SC 989 में स्थापित किया कि क्षेत्राधिकार और न्यायालय शुल्क के प्रश्न तात्विक महत्व के हैं और उन्हें प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाना चाहिए। गलत मूल्यांकन वाद को खारिज करने या उसे वापस करने का आधार बन सकता है।

वाद का प्रस्तुतीकरण एवं पंजीकरण (Presentation & Registration) - धारा २६, आदेश IV

तैयार वादपत्र को दो प्रतियों में (आदेश IV, नियम 1) संबंधित न्यायालय के फाइलिंग काउंटर पर प्रस्तुत किया जाता है। न्यायालय का प्रशासनिक स्टाफ (स्रेस्तेदार/रीडर) वादपत्र की जांच (scrutiny) करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह प्रक्रियात्मक रूप से सही है और इसमें कोई कमी नहीं है। कमियों को दूर करने के बाद, वाद को एक संख्या आवंटित की जाती है और उसे सिविल वादों के रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इसी बिंदु पर वाद औपचारिक रूप से "संस्थित" (instituted) माना जाता है।

वाद की पहली सुनवाई एवं समन (First Hearing & Summons) - आदेश V

वाद के पंजीकरण के बाद, मामला पहली बार न्यायालय के समक्ष आता है। यदि न्यायालय संतुष्ट है कि वाद सही ढंग से प्रस्तुत किया गया है, तो वह प्रतिवादी को उपस्थित होने और अपनी प्रतिरक्षा प्रस्तुत करने के लिए समन जारी करने का आदेश देता है। यहीं से प्रतिवादी के विरुद्ध न्यायिक प्रक्रिया का आरम्भ होता है।


प्रतिरक्षा का प्रथम अवसर: आदेश VII, नियम 11

प्रतिवादी के लिए, सबसे शक्तिशाली प्रारंभिक बचाव विचारण में प्रवेश किए बिना ही वाद को समाप्त कराना है। आदेश VII, नियम ११ उसे यह अवसर प्रदान करता है, जिसे कानून की भाषा में 'डीमरर' (Demurrer) कहा जाता है। यदि प्रतिरक्षा यह प्रदर्शित कर सकती है कि वादपत्र अपने चेहरे पर ही (ex-facie) कानून द्वारा वर्जित है, तो उसे नामंजूर कर दिया जाएगा।

"वादपत्र को समग्र रूप में पढ़ा जाना चाहिए। यदि एक चतुराईपूर्ण आलेखन से वाद-हेतुक का भ्रम पैदा किया गया हो और वास्तव में वाद विधि द्वारा वर्जित हो, तो यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह आदेश VII, नियम 11 के तहत शक्ति का प्रयोग करे।"

अद्यतन न्यायिक दृष्टांत: दहीबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली, (2020) 7 SCC 366

निष्कर्ष

एक सिविल वाद का संस्थित किया जाना एक कला और विज्ञान दोनों है। इसमें विधिक सिद्धांतों की गहरी समझ (विज्ञान) और उन्हें एक सुसंगत और प्रेरक कथा (कला) में प्रस्तुत करने की क्षमता की आवश्यकता होती है। प्रक्रिया के प्रत्येक चरण का अनुपालन न केवल एक औपचारिकता है, बल्कि न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों को बनाए रखने का एक साधन है। एक सावधानीपूर्वक और रणनीतिक रूप से दायर किया गया वाद, एक सफल मुकदमेबाजी की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

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